जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार, डायबिटीज का सर्वश्रेष्ठ उपचार

डायबिटीज के लिए दस सर्वश्रेष्ठ जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार

क्या जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार डायबिटीज नियंत्रित करने में मदद कर सकता है? इन दस सर्वश्रेष्ठ जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार ने ब्लड शुगर को कम करने, इंसुलिन की संवेदनशीलता बढ़ाने, उच्च रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को कम करने में डायबिटीज से पीड़ित मरीजों को काफी लाभ पहुँचाया है.

अपने आहार के साथ किसी भी नई दवा को जोड़ने से पहले अपने डॉक्टर से बात करें. खासकर तब जब उस दवा में आपके ब्लड शुगर को कम करने की क्षमता हो. आपको अपने ब्लड शुगर को अधिक बार जांचना पड़ सकता है. और संभवत: आपके डॉक्टर को आपकी दवा की खुराक को समायोजित करना पड़ सकता है. यदि आपको एक या दो महीने के बाद परिणाम दिखाई न दे, तो अपना पैसा बर्बाद करना बंद कर दें.

अधिक जानकारी के लिए आप जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार के विशेषज्ञ नंदन वर्मा की सलाह ले सकते हैं.

डायबिटीज की रामबाण दवा है जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार

गुरमार पाउडर – जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार में पहला स्थान

मुख्य उपयोग: ब्लड शुगर को कम करना

विशिष्ट खुराक: 200 से 250 मिलीग्राम दिन में दो बार

इस पौधे के नाम का हिंदी अनुवाद “चीनी विध्वंसक” होता है. और माना जाता है कि यह पौधा मिठास का पता लगाने की क्षमता को कम करता है. इसमें कसैले और यकृत उत्तेजक गुण होते हैं, जो सामान्य स्तर का ब्लड शुगर बनाए रखने के लिए अग्न्याशय अधिवृक्क ग्रंथियों और पाचन ग्रंथियों पर कार्य करते हैं. गुरमार जिगर और गुर्दा की मेटाबोलिक गतिविधियों को बनाए रखने में मदद कर सकता है.

डायबिटीज में ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने के लिए इसे सबसे शक्तिशाली जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार में से एक माना जाता है. कोशिकाओं को ग्लूकोज का उपयोग करने में मदद करनेवाले या इंसुलिन के उत्पादन को उत्तेजित करनेवाले एंजाइमों की गतिविधियों को बढ़ाकर यह आपकी काफी मदद कर सकता है. यद्यपि इसका व्यापक रूप से अध्ययन नहीं किया गया है, फिर भी यह किसी गंभीर साइड इफेक्ट का कारण नहीं है.

करेले का जूस – जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार में दूसरा स्थान

मुख्य उपयोग: ब्लड शुगर को कम करना

विशिष्ट खुराक: 50 से 100 मिलीलीटर रस (लगभग 3 से 6 बड़ा चमचा) दैनिक

उचित रूप से नामित, कड़वे करेले का जूस, कोशिकाओं को ग्लूकोज को अधिक प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने में मदद करता है. और आंत में चीनी अवशोषण को ब्लॉक करने में मदद करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है. जब फिलीपीन के शोधकर्ताओं ने पुरुष और महिलाओं को तीन महीने के लिए कैप्सूल के रूप में कड़वे करेले का सेवन कराया, तो उन्होंने पाया कि उनलोगों में थोड़ी सी, लेकिन लगातार, एक ऐसी दवाई जिसमें कोई चिकित्सीय प्रभाव नहीं है, लेने वालों की तुलना में ब्लड शुगर का लेवल कम था.

करेले का जूस ब्लड शुगर (रक्त शर्करा) के स्तर को बनाए रखने में मदद करता है. इस तरह की जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार आपके स्वास्थ्य को कई तरह से बेहतर बना सकता है. करेला रक्त परिसंचरण में उचित सुधार करने में मदद करता है. करेले में फास्फोरस काफी मात्रा में पाया जाता है. इसीलिए यह दाँत, मस्तिष्क, हड्डी, ब्लड और अन्य शारीरिक अंगो के लिए जरुरी फास्फोरस की पूर्ति भी कर सकता है. करेले में इन्सुलिन पर्यात मात्रा में होता है. इसलिए यह ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में समर्थ है.

मैग्नीशियम – जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार में तीसरा स्थान

मुख्य उपयोग: ब्लड शुगर को कम करना

विशिष्ट खुराक: एक दिन में एक बार 250 से 350 मिलीग्राम

मैग्नीशियम की कमी डायबिटीज से पीड़ित मरीजों में असामान्य बात नहीं है. जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार के बिना यह कमी उच्च ब्लड शुगर और इंसुलिन प्रतिरोध को खराब कर सकती है. कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि मैग्नीशियम का पूरक इंसुलिन के कामकाज को ठीक कर सकता है और ब्लड शुगर (रक्त शर्करा) के स्तर को कम कर सकता है.

लेकिन अन्य अध्ययनों में इसका कोई फायदा नज़र नहीं आया है. मैग्नीशियम का सप्लीमेंट लेने से पहले अपने डॉक्टर से मिलकर इस कमी के लिए आपको जांच करवानी पड़ सकती है.

कांटेदार नाशपाती कैक्टस – जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार में चौथा स्थान

मुख्य उपयोग: ब्लड शुगर को कम करना

विशिष्ट खुराक: यदि आप इसे एक भोजन के रूप में खाते हैं, तो एक दिन में 1/2 कप पका हुआ कैक्टस फल का लक्ष्य रखें. अन्यथा, लेबल पर अंकित दिशानिर्देश का पालन करें.

इस कैक्टस का पका हुआ (परिपक्व) फल कुछ छोटे अध्ययनों में ब्लड शुगर के स्तर को कम करने के लिए दिखाया गया है. आप अपने किराने की दुकान में इस फल को ढूंढ सकते हैं, लेकिन यदि यह फल वहां नहीं मिले, तो स्वास्थ्य खाद्य भंडार पर इसे रस या पाउडर के रूप में खरीद सकते हैं.

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह फल संभवतः ब्लड शुगर को कम कर सकता है क्योंकि इसमें इंसुलिन के समान काम करने वाले घटक मौजूद हैं. इस फल में फाइबर भी उच्च मात्रा में है. जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार की विशेषता यह होती है कि इनका कोई दुष्परिणाम नहीं है.

गामा-लिनोलेनिक एसिड – जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार में पाँचवाँ स्थान

मुख्य उपयोग: तंत्रिका दर्द को आसान बनाना

विशिष्ट खुराक: एक दिन में 270 से 540 मिलीग्राम एक बार.

गामा-लिनोलेनिक एसिड, या जीएलए, एक फैटी एसिड है जो इवनिंग प्रिमरोज आयल में पाया जाता है. कुछ शोध से पता चलता है कि डायबिटीज से पीड़ित मरीजों में जीएलए का स्तर इष्टतम स्तर से भी कम होता है. और अध्ययनों से पता चला है कि यह सप्लीमेंट डायबिटीज से जुड़े तंत्रिका दर्द को कम करके उसे रोक सकता है. गामा-लिनोलेनिक एसिड का प्रयोग कई बीमारियों, स्थितियों और लक्षणों के उपचार, नियंत्रण, रोकथाम और सुधार के लिए किया जाता है. जैसे – छाती में दर्द, खुजली, सूजन-संबंधी रोग और मधुमेह-संबंधी तंत्रिकाविकृति.

डायबिटीज के दुष्परिणाम न्यूरोपैथी में जीएलए के संभावित लाभों के लिए इसका अध्ययन किया गया है. मधुमेह के रोगियों में आवश्यक फैटी एसिड चयापचय की असामान्यताएं हैं, और इसलिए इन रोगियों में आवश्यक फैटी एसिड की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है. अध्ययनों से पता चला है कि मोतियाबिंद, रेटिनोपैथी और हृदय संबंधी क्षति के विकास को आवश्यक फैटी एसिड के बड़े दैनिक खुराक से धीमा किया जा सकता है. GLA के साथ इलाज करते समय नैदानिक ​​अध्ययन ने न्यूरोपैथी के लगातार और प्रगतिशील सुधार का प्रदर्शन किया है.

क्रोमियम – जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार में छठा स्थान

मुख्य उपयोग: ब्लड शुगर को कम करना

विशिष्ट खुराक: एक बार दैनिक 200 माइक्रोग्राम.

माना जाता है कि यह ट्रेस खनिज इंसुलिन की कार्रवाई बढ़ाने के साथ-साथ कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन चयापचय में भी शामिल है. कुछ शोध से पता चलता है कि यह ब्लड शुगर को सामान्य करने में मदद करता है. लेकिन ऐसा केवल क्रोमियम की कमी वाले लोगों में ही होता है.

क्रोमियम के पूरक का अध्ययन विभिन्न संकेतों, विशेष रूप से मधुमेह और वजन घटाने के लिए किया गया है, लेकिन नैदानिक ​​अध्ययनों में असंगत परिणामों का पता चला है.

बुलबेरी – जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार में सातवाँ स्थान

मुख्य उपयोग: आंखों और नसों की रक्षा करना

विशिष्ट खुराक: 80 से 120 मिलीग्राम प्रति दिन दो बार.

इसे ब्लूबेरी का एक रिश्तेदार माना जाता है. इसके फल और पत्तियों में शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट होते हैं. एंटीऑक्सीडिन नामक ये एंटीऑक्सिडेंट, छोटे रक्त वाहिकाओं को किसी भी नुकसान से बचने में मदद करते हैं जो नर्व दर्द और रेटिनोपैथी (आंख की रेटिना को नुकसान) के रूप में परिवर्तित हो सकते हैं. पशु अध्ययनों से यह भी सुझाव दिया गया है कि ब्लूबेरी ब्लड शुगर को कम कर सकता है.

अल्फ़ा लिपोइक अम्ल – जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार में आठवाँ स्थान

मुख्य उपयोग: ब्लड शुगर को कम करना, तंत्रिका दर्द को आसान बनाना.

विशिष्ट खुराक: 600 से 800 मिलीग्राम प्रतिदिन दिन.

अल्फ़ा लिपोइक अम्ल को शोर्ट में एएलए कहा जाता है, यह विटामिन-जैसे पदार्थ कई प्रकार के मुक्त कणों को निष्क्रिय कर देता है. उच्च ब्लड शुगर की वजह से मुक्त कणों का निर्माण, तंत्रिका क्षति और अन्य समस्याओं का कारण बन सकता है. एएलए मांसपेशियों की कोशिकाओं को ब्लड शुगर लेने में भी मदद कर सकता है. एक जर्मन अध्ययन में, वैज्ञानिकों की एक टीम ने 40 वयस्कों को एएलए सप्लीमेंट या कोई भी दूसरी दवा लेने को कहा.

चार सप्ताह के अध्ययन के अंत में, एएलए समूह ने अपने इंसुलिन संवेदनशीलता में 27 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की थी. दूसरी दवा लेने वाले समूह में कोई सुधार नहीं देखा गया. अन्य अध्ययनों में पाया गया कि इससे तंत्रिका दर्द, स्तब्धता और जलन में कमी आती है.

मेंथी – जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार में नौवाँ स्थान

मुख्य उपयोग: ब्लड शुगर को कम करना

विशिष्ट खुराक: प्रत्येक भोजन के साथ 5 से 30 ग्राम या प्रति दिन एक भोजन के साथ 15 से 90 ग्राम.

इन बीजों को भारत में खाना पकाने में इस्तेमाल किया जाता है. कई पशु और मानव अध्ययनों के अनुसार, इन बीजों में ब्लड शुगर को कम करने, इंसुलिन की संवेदनशीलता में वृद्धि और उच्च कोलेस्ट्रॉल कम करने के गुण पाए जाते हैं. यह प्रभाव आंशिक रूप से बीज की उच्च फाइबर सामग्री के कारण हो सकता है.

मेंथी के बीज में एक एमिनो एसिड होता है, जो इंसुलिन के प्रवाह को बढ़ावा देता है. मेथी पर सबसे बड़े अध्ययनों में से एक में, 60 लोग जिन्होंने 25 ग्राम मेंथी रोज़ ली, उनमें ब्लड शुगर नियंत्रण में महत्वपूर्ण सुधार हुआ.

जिनसेंग – जड़ी-बूटियाँ और पूरक आहार में दसवाँ स्थान

मुख्य उपयोग: ब्लड शुगर को कम करना

विशिष्ट खुराक: कैप्सूल या टैबलेट के फॉर्म में प्रति दिन 1 से 3 ग्राम या 3 से 5 मिलीलीटर को पीसकर प्रतिदिन तीन बार.

इसकी प्रतिरक्षा बढ़ाने की क्षमता और बीमारी से लड़ने वाले लाभ के लिए इसे जाना जाता है. इस चीनी जड़ी बूटी पर डायबिटीज के कई सकारात्मक अध्ययन हो चुके हैं. शोधकर्ताओं ने पाया है कि जिनसेंग कार्बोहाइड्रेट अवशोषण को धीमा कर देता है; कोशिकाओं की ग्लूकोज का इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ जाती है; और अग्न्याशय से इंसुलिन स्राव बढ़ता है.

टोरंटो विश्वविद्यालय से एक टीम ने बार-बार प्रदर्शन किया है कि दूसरी गोलियों की तुलना में जिनसेंग कैप्सूल रक्त शर्करा का स्तर 15 से 20 प्रतिशत कम कर सकता है.

ब्लड शुगर का गहन नियंत्रण मौत को दावत है.

ब्लड शुगर का गहन नियंत्रण

शोधकर्ताओं का कहना है कि डायबिटीज (मधुमेह) में ब्लड शुगर का गहन नियंत्रण मौत को जल्दी बुलाता है.

शोधकर्ताओं की एक टीम ने पाया है कि टाइप-2 डायबिटीज में कम रक्त शर्करा के लक्ष्य को हासिल करने के लिए लोग ब्लड शुगर का गहन नियंत्रण करने लगे हैं. ब्लड शुगर का गहन नियंत्रण करने से मृत्यु दर बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है. 2004 और 2015 के बीच एकत्र किए गए ब्रिटेन में 3, 00,000 से अधिक लोगों के नियमित आंकड़ों को देखते हुए शोधकर्ताओं ने एक चौकाने वाला खुलासा किया.

शोधकर्ताओं ने पाया कि ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन के निचले स्तर – आमतौर पर अच्छा मधुमेह नियंत्रण होने के रूप में माना जाता है – मध्यम स्तर की तुलना में मृत्यु दर में बढ़ोतरी के जोखिम से जुड़े थे. यह विशेष रूप से गहन उपचार के संयोजन के साथ जुड़ा हुआ है जो हाइपोग्लाइसीमिया पैदा कर सकता है.

डायबिटीज में ब्लड शुगर का गहन नियंत्रण कैसे होता है?

ग्लूकोज का गहन नियंत्रण एक ऐसे उपचार के द्वारा किया जाता है, जिसका उद्देश्य कम औसत रक्त ग्लूकोज परिणाम प्राप्त करना है. ऐसा माना जाता रहा है कि ग्लूकोज का गहन नियंत्रण व्यापक रूप से मधुमेह की जटिलताओं के जोखिम को कम करता है. दुनिया भर के चिकित्सक मानते रहे हैं कि ब्लड शुगर का गहन नियंत्रण मधुमेह संबंधी जटिलताओं के जोखिम को कम करता है, लेकिन यह हर किसी के लिए उचित नहीं है.

ब्लड शुगर का गहन नियंत्रण किसी भी ऐसे उपचार व्यवस्था के द्वारा किया जा सकता है जो लंबे समय तक रक्त शर्करा को कम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है. अलग-अलग रोगियों के बीच इस तरह की उपचार व्यवस्था भिन्न परिणाम दे सकती है. टाइप-2 डायबिटीज़ वाले लोगों के लिए, इसमें अधिक शक्तिशाली दवाएं शामिल हो सकती हैं, जैसे कि सुल्फोनीलयूरिया (उदाहरण: ग्लिक्लाजाइड), इंसुलिन या ड्रग्स का एक संयोजन.

टाइप-1 डायबिटीज़ वाले लोगों के लिए, इसमें कई इंसुलिन इंजेक्शन या डायबिटीज पंप पर जाने की व्यवस्था शामिल हो सकती है – इसे गहन इंसुलिन थेरेपी कहा जाता है.

कार्डिफ यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ता क्रेग करी ने कहा: “उपचार संबंधी दिशानिर्देश आम तौर पर चिकित्सीय रणनीतियों की सिफारिश करते हैं. ये चिकित्सीय रणनीतियाँ ग्लूकोज नियंत्रण के निम्न स्तर को हासिल करने के लिए लक्षित होती हैं, और यह समझकर बनाई जाती हैं कि यह कोरोनरी धमनी रोग और स्ट्रोक जैसी मैक्रोवास्कुलर जटिलताओं के जोखिम को कम करता है.

इस विश्वास के विपरीत, हमारे निष्कर्ष दृढ़तापूर्वक दिखाते हैं कि जिसे आप अच्छा ग्लूकोज नियंत्रण मानते हैं, या निम्न एचबीए1सी मानते हैं उसका मृत्यु दर में वृद्धि के जोखिम के साथ एक रिश्ता है.”

डायबिटीज आहार या शुगर की दवा द्वारा ब्लड शुगर का गहन नियंत्रण

अध्ययन के निष्कर्षों से यह भी पता चलता है कि न तो बेतरतीब परीक्षण और न ही अवलोकन संबंधी अध्ययन ग्लूकोज नियंत्रण और प्रतिकूल परिणाम के स्तर के बीच सहयोग के एक सुसंगत पैटर्न को प्रदर्शित करने में सक्षम हैं, वो भी बिना किसी विवरण के. इस प्रकार, टाइप-2 डायबिटीज (मधुमेह) वाले मरीजों में ग्लूकोज नियंत्रण का इष्टतम लक्ष्य अनिश्चित है.

इसके अलावा, ग्लूकोज नियंत्रण के संबंध में मृत्यु दर का पैटर्न अलग-अलग प्रकार की डायबिटीज (मधुमेह) दवाओं के संबंध में अलग-अलग है. सबसे चिंता का विषय उन लोगों में मृत्यु दर जोखिम में वृद्धि थी जो टाइप-2 डायबिटीज़ के साथ ‘अच्छे नियंत्रण’ वाले थे. जिनका इलाज इंसुलिन और अन्य ग्लूकोज कम करनेवाली दवाओं से किया गया था, इस तरह की दवाएँ हाइपोग्लाइसीमिया को उत्पन्न करते हैं.

करी ने कहा: “गंभीर सवाल कुछ ग्लूकोज कम करने वाली दवाओं की सुरक्षा के बारे में रहते हैं. इन दवाओं को वैज्ञानिक साक्ष्य और विरोधी विचारों के द्वारा विरोध करते हुए बड़े पैमाने पर नजरअंदाज किया जाता है.”

क्या आप जानते हैं कि डायबिटीज में नंदन वर्मा  की सलाह पर मेटाबोलिज्म को स्वस्थ बनाना ब्लड शुगर का गहन नियंत्रण करने से कई गुना बेहतर है?

डायबिटीज में नंदन वर्मा की सलाह पर प्राकृतिक उपचार लेने से मरीज़ की मेटाबोलिज्म स्वस्थ हो जाती है, जिससे खतरनाक दवाओं से मुक्ति मिल जाती है. और कुछ महीनों के बाद बिना किसी दवा के ही ब्लड शुगर सामान्य रहने लगता है.

पूरी जानकारी के लिये फ़ोन करें: +91-9852261622.

मेटाबोलिज्म और डायबिटीज का मेटाबोलिक उपचार

मेटाबोलिज्म और डायबिटीज

एक स्वस्थ व्यक्ति और डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति के मेटाबोलिज्म में अंतर होता है. टाइप-2 डायबिटीज में इन्सुलिन का प्रभाव कम हो जाता है. और टाइप-1 डायबिटीज में शरीर में इन्सुलिन का लेवल बहुत कम होता है.

इसलिये टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित मरीजों को शरीर में किसी ओर पद्धति से इन्सुलिन पहुँचाना पड़ता है. प्री-डायबिटीज में प्रायः इन्सुलिन रेसिस्टेंस होता है. मेटाबोलिक सिंड्रोम और टाइप-2 डायबिटीज हमारे शरीर की चयापचय की क्षमता को बिगाड़ देती है.

परिणामस्वरूप, ब्लड शुगर बढ़ने लगता है. शरीर का वजन बढ़ने लगता है. और इन्सुलिन रेसिस्टेंस भी काफी बढ़ जाता है. इसलिए डायबिटीज में जब कोई दवा काम न आये, तो एक बार नंदन वर्मा की सलाह लें.

मेटाबोलिज्म क्या है?

जीवित प्राणियों की कोशिकाओं में होनेवाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं को मेटाबोलिज्म कहा जाता है. ये प्रतिक्रियाएं जीवित रहने के लिये जरुरी हैं. दूसरे शब्दों में एक बार भोजन खा लेने के बाद शरीर में होनेवाली प्रक्रियाओं को मेटाबोलिज्म कहते हैं.

मेटाबोलिज्म की प्रक्रियाएँ

डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति और एक स्वस्थ व्यक्ति की मेटाबोलिज्म एक समान होती है. लेकिन एक अंतर इन दोनों मेटाबोलिज्म को अलग कर देती है. वह अंतर क्या है? शरीर में बन रहा इन्सुलिन और इन्सुलिन का प्रभाव. जी हाँ. यही वह अंतर है जो डायबिटिक मेटाबोलिज्म को एक स्वस्थ व्यक्ति के मेटाबोलिज्म से अलग करता है.
मेटाबोलिज्म की प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं.

  1. हम भोजन ग्रहण करते हैं.
  2. लार और आंत के द्वारा कार्बोहायड्रेट विभाजित होकर ग्लूकोज में बदल जाता है.
  3. ग्लूकोज रक्तधारा में प्रवेश करती है.
  4. भोजन उपलब्ध होने पर पैंक्रियाज संग्रहित इन्सुलिन को मुक्त करके प्रतिक्रिया देती है. इसे पैंक्रियाज की पहली प्रतिक्रिया कहते हैं.
  5. इन्सुलिन की मदद से ग्लूकोज रक्त से शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश करती है. कोशिकाएं इस ग्लूकोज को अपने आहार के रूप में प्रयोग करती है.
  6. इन्सुलिन की मदद से हमारी मांसपेशियां और लीवर भी ग्लूकोज को ग्लाइकोजन के रूप में संग्रहित करती है.
  7. जरुरत पड़ी तो बाद में यह संग्रहित ग्लाइकोजन रक्त में ग्लूकोज के रूप में वापस भेजा जा सकता है.
  8. अगर खून में ग्लूकोज बचा रह जाय तो इन्सुलिन इस ग्लूकोज को सैचुरेटेड बॉडी फैट में बदल देता है.
  9. भोजन में प्राप्त प्रोटीन भी कुछ हद तक ग्लूकोज के रूप में विभाजित हो जाता है. लेकिन कार्बोहायड्रेट की तुलना में यह प्रक्रिया धीमी होती है.
  10. संग्रहित इन्सुलिन को पहली प्रतिक्रिया देते वक़्त छोड़ने के बाद पैंक्रियाज में मौजूद बीटा सेल्स नया इन्सुलिन बनाना शुरू कर देती है. ताकि इस इन्सुलिन को भी छोड़ा जा सके. इसे पैंक्रियाज की दूसरी प्रतिक्रिया कहते हैं.
  11. जैसा कि ऊपर लिखा गया है. अगर ब्लड से इस हद तक ग्लूकोज निकाल लिया जाय कि ब्लड शुगर का लेवल बहुत कम हो जाय. तो हमारा शरीर ग्लूकागन छोड़ती है.
  12. ग्लूकागन संग्रहित ग्लाइकोजन हो ग्लूकोज में परिवर्तित कर देता है. फिर इस ग्लूकोज को रक्तधारा में पहुँचा दिया जाता है.

    मोटापा से जुड़े टाइप-2 डायबिटीज में मेटाबोलिज्म की भूमिका

    प्री-डायबिटीज या टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित वजनदार (मोटापा से ग्रसित) व्यक्ति का शरीर एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर की तुलना में बहुत अधिक इन्सुलिन का निर्माण करता है. परिणामस्वरूप शरीर के फैट का अनुपात तेज गति से मांसपेशियों से भी अधिक हो जाता है.

    इसकी मुख्य वजह इन्सुलिन रेसिस्टेंस है. और इसका मतलब यह हुआ कि शरीर इन्सुलिन का उपयोग प्रभावशाली तरीके से नहीं कर पा रही है.

    इसलिये ऐसा लगता है कि शरीर को इसकी भरपाई करने के लिए और इन्सुलिन का निर्माण करना चाहिये.

    इनता अधिक इन्सुलिन बनाने का बोझ पड़ने पर बीटा सेल्स का काम बढ़ जाता है. समय के साथ-साथ काम के बोझ तले बीटा सेल्स दम तोड़ देती है.

    इसके अलावा शरीर में बढ़ती हुई इन्सुलिन की मात्रा शरीर को इसके प्रति और अधिक रेसिस्टेंट बना देती है. जैसे किसी नशा का सेवन करने वाले व्यक्ति की उस नशा के प्रति टोलेरेंस विकसित हो जाती है.

    क्या इन्सुलिन रेसिस्टेंस से ब्लड शुगर बढ़ता है?

    अगर शरीर में इन्सुलिन रेसिस्टेंस हो तो क्या होता है? ऐसा होने पर पैंक्रियाज की पहली प्रतिक्रिया में निकलने वाले इन्सुलिन का शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. पैंक्रियाज की पहली प्रतिक्रिया के बारे में ऊपर पढ़ें. पैंक्रियाज भोजन की उपलब्धता होने पर सभी संग्रहित इन्सुलिन को छोड़ती है. लेकिन इतना इन्सुलिन पर्याप्त नहीं होता है. क्योंकि शरीर में इन्सुलिन का प्रभाव कम हो चुका होता है.

    इस समस्या से निपटने के लिए शरीर को पैंक्रियाज की दूसरी प्रतिक्रिया से निकलने वाले इन्सुलिन का इंतज़ार करना पड़ता है. लेकिन पैंक्रियाज की दूसरी प्रतिक्रिया में थोड़ा समय लगता है. इस बीच में, इन्सुलिन की पर्याप्त उपलब्धता की कमी की वजह से, प्री-डायबिटीज या टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित व्यक्तियों का ब्लड शुगर नार्मल से अधिक रेंज से अधिक बढ़ सकता है.

    अगर अगला भोजन खाने में थोड़ी देर लगायेंगे तो शरीर को नया इन्सुलिन बनाने का समय मिल जाएगा. ताकि ब्लड शुगर लेवल को फिर से नार्मल किया जा सके.

    यह बात ऊपर पढ़ी आपने. इससे बीटा सेल्स पर अतिरिक्त भार पड़ता है. जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है. इस प्रकार इन्सुलिन का निर्माण करनेवाली सक्रिय कोशिकाओं की संख्या घट जाती है. समस्या तब और भी बढ़ जाती है जब शरीर के इन्सुलिन निर्माण की क्षमता कम हो जाती है. अब इस समस्या को खुद से बढ़ाना हो तो डायबिटीज के मरीज़ आवश्यकता से अधिक कार्बोहायड्रेट खाएँ. याद रखें कि ब्लड शुगर का लेवल बढ़ जाने पर सुस्ती और भूख अधिक महसूस होती है. क्योंकि कम प्रभावी इन्सुलिन का मतलब ही होता है कि शरीर की कोशिकाओं में ग्लूकोज नहीं जा पा रहा है जो एनर्जी के लिये जरूरी है.

    अगर इस हालत में मरीज़ भूख की वजह से बहुत ज्यादा भोजन ग्रहण कर ले. तो शरीर अतिरिक्त कैलोरी को अतिरिक्त शारीरिक वसा के रूप में ग्रहण करने लगता है. जो इन्सुलिन रेसिस्टेंस को और अधिक बढ़ा सकता है.

    टाइप-1 डायबिटीज में मेटाबोलिज्म की भूमिका

    टाइप-1 डायबिटीज में मेटाबोलिज्म का उचित कामकाज पंप या इंजेक्शन से मिलने वाले इन्सुलिन पर निर्भर करता है. शोर्ट टर्म इन्सुलिन उसी तरह काम करता है जिस तरह पैंक्रियाज की पहली प्रतिक्रिया में निकलने वाला इन्सुलिन काम करता है. लॉन्ग टर्म इन्सुलिन पैंक्रियाज की दूसरी प्रतिक्रिया में निकलने वाले इन्सुलिन की तरह काम करता है.

    अगर इन्सुलिन सही मात्र में शरीर में प्रवेश कराई जाय. और इन्सुलिन के कामकाज की तीव्रता भोजन से मिलने वाले ग्लूकोज की तीव्रता से मेल खाती हो, तो टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित मरीज़ की मेटाबोलिज्म एक स्वस्थ व्यक्ति के मेटाबोलिज्म की तरह काम करती है.

    लेकिन यह सब करना अक्सर मुश्किल होता है. परिणामस्वरूप ब्लड शुगर का लेवल कभी घट जाता है तो कभी बढ़ जाता है.

    चूँकि शरीर में चर्बी जमा करने में इन्सुलिन की भी भूमिका होती है, इसलिए टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित मरीजों के शरीर में भी इन्सुलिन रेसिस्टेंस विकसित हो सकता है. ऐसी स्थिति को डबल डायबिटीज कहा जाता है.

    मेटाबोलिज्म को कैसे स्वस्थ बनाएं?

    मेटाबोलिज्म को स्वस्थ बनाने के लिए कुछ खाद्य पदार्थों का संतुलित और नियमित सेवन करना अनिवार्य है. ऐसा करके आप अपने चयापचय को बढ़ाने के साथ-साथ फैट को कम और हार्मोन को संतुलित कर सकते हैं. लेकिन इन खाद्य पदार्थों से पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए इन्हें एक स्वच्छ आहार के भाग के रूप में लिया जाना चाहिए. इसलिये इन खाद्य पदार्थों को हमने एक मेटाबोलिक डाइट चार्ट में सम्पूर्ण विवरण के साथ शामिल किया है. इस डाइट चार्ट का नियमित रूप से कम से कम चार सप्ताह तक पालन करके आप अपने शरीर के विषाक्त पदार्थों को भी बाहर निकाल सकते हैं। डायबिटीज का मेटाबोलिक डाइट चार्ट मुफ्त में डाउनलोड करने के लिये क्लिक करें: Metabolic Diet Chart for Type-2 Diabetes.

    ऐसा देखा गया है कि इस तरह के डाइट चार्ट का पालन करने के साथ-साथ कुछ आयुर्वेदिक या हर्बल दवाओं का सेवन करने से मेटाबोलिज्म जल्दी स्वस्थ हो जाता है. क्या आप उन आयुर्वेदिक या हर्बल दवाओं का नाम बता सकते हैं?

    मेटाबोलिज्म - Natural Treatment of Diabetes
    मेटाबोलिज्म का प्राकृतिक उपचार ही मेटाबोलिक उपचार है.

    नाम बताने से पहले आइये जानते हैं कि डायबिटीज और इसके दुष्परिणामों से पीड़ित मरीजों को मेटाबोलिज्म को स्वस्थ बनाने के लिये किन औषधीय वनस्पतियों के मिश्रण से बनी दवाओं का प्रयोग करना चाहिए.

    1. वरुण – वरुण पाउडर का प्रयोग खून साफ़ करने के लिए जाना जाता है.
    2. भुई आंवला – यह पौधा लीवर के रोगियों के लिए वरदान माना जाता है.
    3. सिरीस – इसका उपयोग कई बिमारियों में होता है.
    4. पुनर्नवा – पुनर्नवा का रोग निवारण में अपना अति महत्वपूर्ण स्थान है.
    5. गोखरू – यह पुरुषों और महिलाओं के रोगो के लिए रामबाण औषिधि है.
    6. कासनी – यह अमृत सामान चमत्कारी पौधा किडनी और लीवर के लिए वरदान है.
    7. शिग्रु – यह एन्टी-इंफ्लेमेटरी और पाचन ठीक करने वाले गुणों से भरपूर होता है.
    8. अपामार्ग – यह भूख बढ़ानेवाली एवं असाध्य रोगों को ठीक करने वाली औषधि है.
    9. नीम – मधुमेह विरोधी, फंगसरोधी, रक्त को शुद्ध करने वाले और शुक्राणुनाशक गुण होते हैं.
    10. तुलसी – यह जलन और सूजन कम करने और जीवाणुरोधी गुणों से समृद्ध है.
    11. पीपल की छाल – छाल का प्रयोग करने से आप बहुत सी बीमारियों से बच सकते हैं.
    12. दालचीनी – यह रक्‍तशोधक कई खतरनाक बीमारियों से राहत दिला सकता है.
    13. मेंथी – इस बीज में एंटीऑक्सिडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी, मधुमेह विरोधी और एंटीवायरल गुण हैं.
    14. जामुन – डायबिटीज में जामुन की गुठली का चूर्ण बनाकर सेवन किया जाता है.
    15. विजयसार – यह जोड़ों के दर्द, कैल्शियम की कमी, और मधुमेह के लिए बहुत उपयोगी है.
    16. दारुहल्दी – इसे डायबिटीज तथा लीवर रोगों के लिये अतिउपयोगी जाना जाता है.
    17. गुड़मार – यह पैंक्रियाज के सेल्स को रिजेनेरेट होने में मदद करती है.
    18. गिलोय – न तो यह खुद मरती है और न ही सेवन करने वाले को कोई रोग होने देती है.
    19. मंजिष्ठा – यह रक्त में मौजूद विष या अमा की उपस्थिति हटाने में सहायक होती है.
    20. शिलाजीत – यह बलपुष्टिकारक, कामशक्तिवर्धक, ओजवर्द्धक एवं दौर्बल्यनाशक है.

आइये अब बात करते हैं भारत में मिलने वाली उन आयुर्वेदिक और हर्बल दवाओं की जिनमें उपरोक्त औषधीय वनस्पतियों का मिश्रण है. मेटाबोलिक डाइट चार्ट के साथ इन दवाओं का प्रयोग करने से डायबिटीज के मरीजों को एक महीने में ही काफी फायदा होता है.

सहायता प्राप्त करने के लिए, बात करें: +91-9852261622

डायबिटीज में चाय पीना स्वास्थ्यवर्धक है

डायबिटीज में चाय पीना स्वास्थ्यवर्धक है

डायबिटीज में चाय – खासकर ग्रीन टी (हरी चाय) – कोशिकाओं को संवेदनशील बनाकर एक जटिल जैव रासायनिक प्रतिक्रिया के द्वारा मेटाबोलिज्म को मदद पहुंचाती है. अनुसंधानों के द्वारा बताया गया है कि डायबिटीज में चाय की खूबियों को बेहतर तरीके से तभी समझा जा सकता है जब इसका सेवन दूध के बिना किया जाय.

लोग कई शताब्दियों से चाय पीते आ रहे हैं. और आज भी दुनिया में यह पानी के बाद सबसे अधिक लोकप्रिय पेय पदार्थ है. अनुसंधानों से पता चला है कि यह स्वास्थ्यवर्धक भी है. चाय की यह लोकप्रियता इसकी कैंसर को रोकने की क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य को ठीक करने की खूबियों की वजह से है. लेकिन चाय डायबिटीज के मरीजों के लिए भी स्वास्थ्यप्रद है. यह इन्सुलिन सेंसिटिविटी को बढ़ाता है. डायबिटीज में ग्रीन टी (हरी चाय) पीने से मेटाबोलिक सिस्टम को बेहतर तरीके से काम करने में मदद मिलती है.

डायबिटीज में चाय पीने से मेटाबोलिज्म स्वस्थ होती है

डायबिटीज और मेटाबोलिज्म नामक एक पत्रिका में 2013 के एक अनुसन्धान की रिव्यु में चाय की खूबियों के बारे बताया गया. डायबिटीज और मोटापा जो डायबिटीज के रोग को आमंत्रित करता है, इन दोनों ही रोगों से पीड़ित मरीजों के लिए चाय को लाभदायक पाया गया. इस पत्रिका में जापान में किये गए एक अध्ययन को प्रकाशित किया गया था. इस अध्ययन में पाया गया कि जो लोग प्रतिदिन छः कप या उससे ज्यादा ग्रीन टी (हरी चाय) पीते हैं, उनमें टाइप-2 डायबिटीज विकसित होने की सम्भावना, सप्ताह में एक बार ग्रीन टी (हरी चाय) पीने वाले लोगों की तुलना में, 33% कम होती है. इस पत्रिका ने ताइवान में हुए एक रिसर्च के हवाले से खबर दी कि जिन लोगों ने एक दशक से ज्यादा वक़्त तक ग्रीन टी (हरी चाय) का सेवन किया उनकी पतली और शरीर में फैट बहुत कम था.

डायबिटीज में चाय पीना अच्छा माना जाता है, क्योंकि चाय में पोलीफैनोल्स नामक तत्व पाए जाते हैं. पोलीफैनोल्स वास्तव में एंटीऑक्सीडेन्ट्स हैं, जो प्रत्येक पौधे पाए जाते हैं. पोलीफैनोल्स ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करने में मदद करते हैं. ये धमनियों को चौड़ी करते हैं जिससे ब्लड प्रेशर कम हो जाता हैं, खून के थक्के नहीं जमते और कोलेस्ट्रॉल भी कम हो जाता है.

ग्रीन टी (हरी चाय) में पाए जाने वाले पोलीफैनोल्स शरीर में ग्लूकोज को नियंत्रित करने में मदद करते हैं. वैसे खूबियाँ तो हर चाय में होती है, लेकिन ग्रीन टी (हरी चाय) स्पष्ट रूप से विजेता है. क्योंकि जब आप डायबिटीज में ग्रीन टी (हरी चाय) पियेंगे तो आपको ब्लैक टी (काली चाय) की तुलना में अधिक पोलीफैनोल्स प्राप्त होंगे.

डायबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए ग्रीन टी (हरी चाय) स्वास्थ्यवर्धक है क्योंकि यह मेटाबोलिक सिस्टम को बेहतर तरीके से काम करने मदद करती है.

अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि डायबिटीज में चाय पीने से इसमें पाए जानेवाले पोलीफैनोल्स इन्सुलिन एक्टिविटी बढ़ाते हैं.

डायबिटीज में चाय पीने के निम्नलिखित फायदे हैं.

  1. डायबिटीज में चाय इन्सुलिन सेंसिटिविटी को बढ़ाती है.
  2. ग्रीन टी (हरी चाय) ब्लड प्रेशर को नियंत्रित को नियंत्रित करती है.
  3. चाय पीने से खून का थक्का नहीं जमता.
  4. हृदयरोग होने की संभावना कम हो जाती है.
  5. ग्रीन टी (हरी चाय) पीने से टाइप-2 डायबिटीज विकसित होने की संभावना कम हो जाती है.
  6. ग्रीन टी (हरी चाय) पीने से कैंसर होने की सम्भावना भी कम हो जाती है.

अमेरिका में साल 2002 में किये गए एक अध्ययन से पता चला कि चाय में दूध मिलाने से इसकी इंसुलिन-संवेदनशील प्रभाव घट जाती है. पोलीफैनोल्स में एन्टी- ऑक्सीडेटिव गुण होते हैं जो हमें इन्फ्लामेशन और कार्सिनोजन से बचाते हैं. दूसरे शब्दों में, चाय में पाए जानेवाले तत्व हमें टाइप-2 डायबिटीज और कैंसर से बचा सकते हैं.

डायबिटीज में चाय पीने के लाभ स्पष्ट हैं.

लेकिन चाय के अलावा भी कई खाद्य पदार्थ ऐसे हैं जिनमें काफी मात्रा में पोलीफैनोल्स पाए जाते हैं. ऐसे खाद्य पदार्थ टाइप-2 डायबिटीज को रोकने और नियंत्रित करने में काफी लाभदायक हैं. बेरी, अंगूर, सेब और अनार ऐसे फल हैं जो गहरे रंग के होने के कारण पोलीफैनोल्स से भरपूर होते हैं. ब्रोकोली, प्याज, लहसुन, टमाटर, बैंगन और पालक भी पोलीफैनोल्स से भरपूर होते हैं.

सब मिलाकर देखें तो डायबिटीज में चाय पीने के अलावा मेटाबोलिक डाइट चार्ट के अनुसार भोजन करना कोई जटिल काम नहीं है. टाइप-2 डायबिटीज खानपान के लाइफस्टाइल की वजह से होती है. जब हम इससे बचाव की बात करते हैं तो डायबिटीज का मेटाबोलिक डाइट चार्ट काफी मददगार है. इसके अनुसार भोजन करने से आपको भरपूर मात्रा में पोलीफैनोल्स प्राप्त होंगे और आपका शरीर बेहतर तरीके से ब्लड शुगर को नियंत्रित कर पायेगा.

हाथ नीचे कीजिये. ऐसा भोजन खाइये जिसमें काफी मात्रा में पोलीफैनोल्स हो. जैसे लहसुन, चमकीले रंग की फल और सब्जियाँ. और डायबिटीज में चाय पीना – खासकर ग्रीन टी (हरी चाय) – उनलोगों के लिए महान आईडिया है, जो टाइप-2 डायबिटीज को विकसित होने से रोकना चाहते हैं या नियंत्रित करना चाहते हैं.