मेटाबोलिज्म और डायबिटीज का मेटाबोलिक उपचार

मेटाबोलिज्म और डायबिटीज

आइये समझते हैं कि मेटाबोलिक उपचार क्या है. एक स्वस्थ व्यक्ति और डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति के मेटाबोलिज्म में अंतर होता है. टाइप-2 डायबिटीज में इन्सुलिन का प्रभाव कम हो जाता है. और टाइप-1 डायबिटीज में शरीर में इन्सुलिन का लेवल बहुत कम होता है.

इसलिये टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित मरीजों को शरीर में किसी और पद्धति से इन्सुलिन पहुँचाना पड़ता है. प्री-डायबिटीज में प्रायः इन्सुलिन रेसिस्टेंस होता है. मेटाबोलिक सिंड्रोम और टाइप-2 डायबिटीज हमारे शरीर की चयापचय की क्षमता को बिगाड़ देती है.

परिणामस्वरूप, ब्लड शुगर बढ़ने लगता है. शरीर का वजन बढ़ने लगता है. और इन्सुलिन रेसिस्टेंस भी काफी बढ़ जाता है. इसलिए डायबिटीज में जब कोई दवा काम न आये, तो एक बार नंदन वर्मा की सलाह मानकर एक चुटकी हर्बल दवा तीन हफ्ते खाकर देखें. आपको हर्बल अर्थात प्राकृतिक उपचार की ताक़त का अंदाज़ा हो जाएगा.

अगर आपका ब्लड शुगर किसी भी प्रकार से किसी भी उपचार के द्वारा नियंत्रित नहीं हो पा रहा है या आप इन्सुलिन ले रहे हैं तो आपको अपने मेटाबोलिज्म को स्वस्थ बनाना बहुत जरुरी है. अर्थात आपको मेटाबोलिक उपचार की जरुरत है.

मेटाबोलिज्म क्या है? मेटाबोलिक उपचार क्या है?

जीवित प्राणियों की कोशिकाओं में होनेवाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं को मेटाबोलिज्म कहा जाता है. ये प्रतिक्रियाएं जीवित रहने के लिये जरुरी हैं. दूसरे शब्दों में एक बार भोजन खा लेने के बाद शरीर में होनेवाली प्रक्रियाओं को मेटाबोलिज्म कहते हैं.

मेटाबोलिज्म की प्रक्रियाएँ

डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति और एक स्वस्थ व्यक्ति की मेटाबोलिज्म एक समान होती है. लेकिन एक अंतर इन दोनों मेटाबोलिज्म को अलग कर देती है. वह अंतर क्या है? शरीर में बन रहा इन्सुलिन और इन्सुलिन का प्रभाव. जी हाँ. यही वह अंतर है जो डायबिटिक मेटाबोलिज्म को एक स्वस्थ व्यक्ति के मेटाबोलिज्म से अलग करता है.
मेटाबोलिज्म की प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं.

  1. हम भोजन ग्रहण करते हैं.
  2. लार और आंत के द्वारा कार्बोहायड्रेट विभाजित होकर ग्लूकोज में बदल जाता है.
  3. ग्लूकोज रक्तधारा में प्रवेश करती है.
  4. भोजन उपलब्ध होने पर पैंक्रियाज संग्रहित इन्सुलिन को मुक्त करके प्रतिक्रिया देती है. इसे पैंक्रियाज की पहली प्रतिक्रिया कहते हैं.
  5. इन्सुलिन की मदद से ग्लूकोज रक्त से शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश करती है. कोशिकाएं इस ग्लूकोज को अपने आहार के रूप में प्रयोग करती है.
  6. इन्सुलिन की मदद से हमारी मांसपेशियां और लीवर भी ग्लूकोज को ग्लाइकोजन के रूप में संग्रहित करती है.
  7. जरुरत पड़ी तो बाद में यह संग्रहित ग्लाइकोजन रक्त में ग्लूकोज के रूप में वापस भेजा जा सकता है.
  8. अगर खून में ग्लूकोज बचा रह जाय तो इन्सुलिन इस ग्लूकोज को सैचुरेटेड बॉडी फैट में बदल देता है.
  9. भोजन में प्राप्त प्रोटीन भी कुछ हद तक ग्लूकोज के रूप में विभाजित हो जाता है. लेकिन कार्बोहायड्रेट की तुलना में यह प्रक्रिया धीमी होती है.
  10. संग्रहित इन्सुलिन को पहली प्रतिक्रिया देते वक़्त छोड़ने के बाद पैंक्रियाज में मौजूद बीटा सेल्स नया इन्सुलिन बनाना शुरू कर देती है. ताकि इस इन्सुलिन को भी छोड़ा जा सके. इसे पैंक्रियाज की दूसरी प्रतिक्रिया कहते हैं.
  11. जैसा कि ऊपर लिखा गया है. अगर ब्लड से इस हद तक ग्लूकोज निकाल लिया जाय कि ब्लड शुगर का लेवल बहुत कम हो जाय. तो हमारा शरीर ग्लूकागन छोड़ती है.
  12. ग्लूकागन संग्रहित ग्लाइकोजन हो ग्लूकोज में परिवर्तित कर देता है. फिर इस ग्लूकोज को रक्तधारा में पहुँचा दिया जाता है.

    मोटापा से जुड़े टाइप-2 डायबिटीज में मेटाबोलिज्म की भूमिका और मेटाबोलिक उपचार

    प्री-डायबिटीज या टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित वजनदार (मोटापा से ग्रसित) व्यक्ति का शरीर एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर की तुलना में बहुत अधिक इन्सुलिन का निर्माण करता है. परिणामस्वरूप शरीर के फैट का अनुपात तेज गति से मांसपेशियों से भी अधिक हो जाता है.

    इसकी मुख्य वजह इन्सुलिन रेसिस्टेंस है. और इसका मतलब यह हुआ कि शरीर इन्सुलिन का उपयोग प्रभावशाली तरीके से नहीं कर पा रही है.

    इसलिये ऐसा लगता है कि शरीर को इसकी भरपाई करने के लिए और इन्सुलिन का निर्माण करना चाहिये.

    इनता अधिक इन्सुलिन बनाने का बोझ पड़ने पर बीटा सेल्स का काम बढ़ जाता है. समय के साथ-साथ काम के बोझ तले बीटा सेल्स दम तोड़ देती है.

    इसके अलावा शरीर में बढ़ती हुई इन्सुलिन की मात्रा शरीर को इसके प्रति और अधिक रेसिस्टेंट बना देती है. जैसे किसी नशा का सेवन करने वाले व्यक्ति की उस नशा के प्रति टोलेरेंस विकसित हो जाती है.

    क्या इन्सुलिन रेसिस्टेंस से ब्लड शुगर बढ़ता है?

    अगर शरीर में इन्सुलिन रेसिस्टेंस हो तो क्या होता है? ऐसा होने पर पैंक्रियाज की पहली प्रतिक्रिया में निकलने वाले इन्सुलिन का शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. पैंक्रियाज की पहली प्रतिक्रिया के बारे में ऊपर पढ़ें. पैंक्रियाज भोजन की उपलब्धता होने पर सभी संग्रहित इन्सुलिन को छोड़ती है. लेकिन इतना इन्सुलिन पर्याप्त नहीं होता है. क्योंकि शरीर में इन्सुलिन का प्रभाव कम हो चुका होता है.

    इस समस्या से निपटने के लिए शरीर को पैंक्रियाज की दूसरी प्रतिक्रिया से निकलने वाले इन्सुलिन का इंतज़ार करना पड़ता है. लेकिन पैंक्रियाज की दूसरी प्रतिक्रिया में थोड़ा समय लगता है. इस बीच में, इन्सुलिन की पर्याप्त उपलब्धता की कमी की वजह से, प्री-डायबिटीज या टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित व्यक्तियों का ब्लड शुगर नार्मल से अधिक रेंज से अधिक बढ़ सकता है.

    अगर अगला भोजन खाने में थोड़ी देर लगायेंगे तो शरीर को नया इन्सुलिन बनाने का समय मिल जाएगा. ताकि ब्लड शुगर लेवल को फिर से नार्मल किया जा सके.

    यह बात ऊपर पढ़ी आपने. इससे बीटा सेल्स पर अतिरिक्त भार पड़ता है. जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है. इस प्रकार इन्सुलिन का निर्माण करनेवाली सक्रिय कोशिकाओं की संख्या घट जाती है. समस्या तब और भी बढ़ जाती है जब शरीर के इन्सुलिन निर्माण की क्षमता कम हो जाती है. अब इस समस्या को खुद से बढ़ाना हो तो डायबिटीज के मरीज़ आवश्यकता से अधिक कार्बोहायड्रेट खाएँ. याद रखें कि ब्लड शुगर का लेवल बढ़ जाने पर सुस्ती और भूख अधिक महसूस होती है. क्योंकि कम प्रभावी इन्सुलिन का मतलब ही होता है कि शरीर की कोशिकाओं में ग्लूकोज नहीं जा पा रहा है जो एनर्जी के लिये जरूरी है.

    अगर इस हालत में मरीज़ भूख की वजह से बहुत ज्यादा भोजन ग्रहण कर ले. तो शरीर अतिरिक्त कैलोरी को अतिरिक्त शारीरिक वसा के रूप में ग्रहण करने लगता है. जो इन्सुलिन रेसिस्टेंस को और अधिक बढ़ा सकता है.

    टाइप-1 डायबिटीज में मेटाबोलिज्म की भूमिका और मेटाबोलिक उपचार

    टाइप-1 डायबिटीज में मेटाबोलिज्म का उचित कामकाज पंप या इंजेक्शन से मिलने वाले इन्सुलिन पर निर्भर करता है. शोर्ट टर्म इन्सुलिन उसी तरह काम करता है जिस तरह पैंक्रियाज की पहली प्रतिक्रिया में निकलने वाला इन्सुलिन काम करता है. लॉन्ग टर्म इन्सुलिन पैंक्रियाज की दूसरी प्रतिक्रिया में निकलने वाले इन्सुलिन की तरह काम करता है.

    अगर इन्सुलिन सही मात्र में शरीर में प्रवेश कराई जाय. और इन्सुलिन के कामकाज की तीव्रता भोजन से मिलने वाले ग्लूकोज की तीव्रता से मेल खाती हो, तो टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित मरीज़ की मेटाबोलिज्म एक स्वस्थ व्यक्ति के मेटाबोलिज्म की तरह काम करती है.

    लेकिन यह सब करना अक्सर मुश्किल होता है. परिणामस्वरूप ब्लड शुगर का लेवल कभी घट जाता है तो कभी बढ़ जाता है.

    चूँकि शरीर में चर्बी जमा करने में इन्सुलिन की भी भूमिका होती है, इसलिए टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित मरीजों के शरीर में भी इन्सुलिन रेसिस्टेंस विकसित हो सकता है. ऐसी स्थिति को डबल डायबिटीज कहा जाता है.

    मेटाबोलिक उपचार के द्वारा मेटाबोलिज्म को कैसे स्वस्थ बनाएं?

    मेटाबोलिक उपचार के द्वारा मेटाबोलिज्म को स्वस्थ बनाने के लिए कुछ खाद्य पदार्थों का संतुलित और नियमित सेवन करना अनिवार्य है. ऐसा करके आप अपने चयापचय को बढ़ाने के साथ-साथ फैट को कम और हार्मोन को संतुलित कर सकते हैं. लेकिन इन खाद्य पदार्थों से पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए इन्हें एक स्वच्छ आहार के भाग के रूप में लिया जाना चाहिए. इसलिये इन खाद्य पदार्थों को हमने एक मेटाबोलिक डाइट चार्ट में सम्पूर्ण विवरण के साथ शामिल किया है. इस डाइट चार्ट का नियमित रूप से कम से कम चार सप्ताह तक पालन करके आप अपने शरीर के विषाक्त पदार्थों को भी बाहर निकाल सकते हैं। डायबिटीज का मेटाबोलिक डाइट चार्ट डाउनलोड करने के लिये क्लिक करें: Metabolic Diet Chart for Type-2 Diabetes.

    ऐसा देखा गया है कि इस तरह के डाइट चार्ट का पालन करने के साथ-साथ कुछ आयुर्वेदिक या हर्बल दवाओं का सेवन करने से मेटाबोलिज्म जल्दी स्वस्थ हो जाता है. क्या आप उन आयुर्वेदिक या हर्बल दवाओं का नाम बता सकते हैं?

    मेटाबोलिज्म - Natural Treatment of Diabetes
    मेटाबोलिज्म का प्राकृतिक उपचार ही मेटाबोलिक उपचार है.
  13. नाम बताने से पहले आइये जानते हैं कि डायबिटीज और इसके दुष्परिणामों से पीड़ित मरीजों को मेटाबोलिज्म को स्वस्थ बनाने के लिये किन औषधीय वनस्पतियों के मिश्रण से बनी दवाओं का प्रयोग करना चाहिए.
    1. वरुण – वरुण पाउडर का प्रयोग खून साफ़ करने के लिए जाना जाता है.
    2. भुई आंवला – यह पौधा लीवर के रोगियों के लिए वरदान माना जाता है.
    3. सिरीस – इसका उपयोग कई बिमारियों में होता है.
    4. पुनर्नवा – पुनर्नवा का रोग निवारण में अपना अति महत्वपूर्ण स्थान है.
    5. गोखरू – यह पुरुषों और महिलाओं के रोगो के लिए रामबाण औषिधि है.
    6. कासनी – यह अमृत सामान चमत्कारी पौधा किडनी और लीवर के लिए वरदान है.
    7. शिग्रु – यह एन्टी-इंफ्लेमेटरी और पाचन ठीक करने वाले गुणों से भरपूर होता है.
    8. अपामार्ग – यह भूख बढ़ानेवाली एवं असाध्य रोगों को ठीक करने वाली औषधि है.
    9. नीम – मधुमेह विरोधी, फंगसरोधी, रक्त को शुद्ध करने वाले और शुक्राणुनाशक गुण होते हैं.
    10. तुलसी – यह जलन और सूजन कम करने और जीवाणुरोधी गुणों से समृद्ध है.
    11. पीपल की छाल – छाल का प्रयोग करने से आप बहुत सी बीमारियों से बच सकते हैं.
    12. दालचीनी – यह रक्‍तशोधक कई खतरनाक बीमारियों से राहत दिला सकता है.
    13. मेंथी – इस बीज में एंटीऑक्सिडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी, मधुमेह विरोधी और एंटीवायरल गुण हैं.
    14. जामुन – डायबिटीज में जामुन की गुठली का चूर्ण बनाकर सेवन किया जाता है.
    15. विजयसार – यह जोड़ों के दर्द, कैल्शियम की कमी, और मधुमेह के लिए बहुत उपयोगी है.
    16. दारुहल्दी – इसे डायबिटीज तथा लीवर रोगों के लिये अतिउपयोगी जाना जाता है.
    17. गुड़मार – यह पैंक्रियाज के सेल्स को रिजेनेरेट होने में मदद करती है.
    18. गिलोय – न तो यह खुद मरती है और न ही सेवन करने वाले को कोई रोग होने देती है.
    19. मंजिष्ठा – यह रक्त में मौजूद विष या अमा की उपस्थिति हटाने में सहायक होती है.
    20. शिलाजीत – यह बलपुष्टिकारक, कामशक्तिवर्धक, ओजवर्द्धक एवं दौर्बल्यनाशक है.

आइये अब बात करते हैं भारत में मिलने वाली उन आयुर्वेदिक और हर्बल दवाओं की जिनमें उपरोक्त औषधीय वनस्पतियों का मिश्रण है. मेटाबोलिक डाइट चार्ट के साथ इन दवाओं का प्रयोग करने से डायबिटीज के मरीजों को एक महीने में ही काफी फायदा होता है.

सहायता प्राप्त करने के लिए, बात करें: +91-9852261622

Summary
मेटाबोलिक उपचार क्या है? मेटाबोलिज्म और डायबिटीज का मेटाबोलिक उपचार
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मेटाबोलिक उपचार क्या है? मेटाबोलिज्म और डायबिटीज का मेटाबोलिक उपचार
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मेटाबोलिक उपचार क्या है? मेटाबोलिज्म क्या है? मेटाबोलिक चिकित्सा क्या है? मेटाबोलिक उपचार पद्धति क्या है? डायबिटीज में मेटाबोलिक उपचार की भूमिका क्या है?
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