बायोनिक किडनी से पाएँ डायलिसिस की झंझट से छुटकारा
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बायोनिक किडनी से पाएँ डायलिसिस की झंझट से छुटकारा

Posted On February 7, 2018 at 7:20 pm by / No Comments

यह बिलकुल भी जरुरी नहीं है कि प्राकृतिक उपचार हमेशा एक चिकित्सीय स्थिति के लिए अच्छा ही हो, लेकिन फिर भी यह उपचार प्रभावी हो सकता है. कभी-कभी, गंभीर परिस्थितियों में, केवल मेडिकल टेक्नोलॉजी ही मदद कर सकती है, जैसे- बायोनिक किडनी के मामले में. डायलिसिस के बिना, एक रोगी जीवित नहीं रह सकता है. और जो पीड़ित को अधिक परेशान करता है, वह है - गुर्दा प्रत्यारोपण की लम्बी प्रतीक्षा सूची.

अभी तक इस रोग को एक मायावी बीमारी माना जाता रहा है. किडनी फेलियर की वजह से एक डायलिसिस रोगी को भारी पीड़ा झेलनी पड़ती है. ऐसा प्रतीत होता है मानो क्षितिज पर कोई अन्य समाधान ही न हो. यह वह परिस्थिति है जिसमें हमें मेडिकल टेक्नोलॉजी की जरुरत पड़ती है.

प्राकृतिक उपचार वास्तव में बहुत शक्तिशाली है, लेकिन जीवन में कुछ ऐसे मौके आते हैं जब हमें मॉडर्न टेक्नोलॉजी को अपनाना पड़ता है. हालांकि, इसे अंधेरे सुरंग में अंततः एक प्रकाश ही कहा जा सकता है - संयुक्त राज्य अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में, कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों ने दुनिया की पहली बायोनिक किडनी विकसित की है जो क्षतिग्रस्त किडनी को आसानी से और कारगर ढंग से बदल सकती है.

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सामान्य शल्य चिकित्सा के माध्यम से बायोनिक किडनी शरीर में डाली जा सकती है.

बायोनिक किडनी हमारे गुर्दे (किडनी) की एक सही प्रतिकृति है. इसमें कई माइक्रोचिप्स होते हैं जो दिल से संचालित होते हैं. सामान्य गुर्दे (किडनी) की तरह, यह खून से मलबे और विषाक्त पदार्थों को फ़िल्टर कर सकता है. बायोनिक किडनी को शरीर में एक सामान्य सर्जिकल प्रक्रिया द्वारा डाला जा सकता है और यह कुशलतापूर्वक काम करने के लिए साबित हो चुका है. यह अब एक क्षतिग्रस्त गुर्दे (किडनी) के लिए सही प्रतिस्थापन साबित हो रहा है.

बायोनिक किडनी

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोध दल के सदस्य शुवो रॉय और वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर में नेफ्रोलॉजिस्ट और एसोसिएट प्रोफेसर, विलियम एच फिसेल ने कहा है कि यह आविष्कार, किडनी की विफलता से पीड़ित लाखों लोगों और जो डायलिसिस पर हैं, उनको आशा देने के लिए तैयार है. अब, आप में से कुछ लोग ऐसा सोच सकते हैं कि "लेकिन, क्या हुआ अगर शरीर इसे अस्वीकार कर देता है?", लेकिन वैज्ञानिक हमें आश्वस्त करते हैं कि अस्वीकृति की संभावना शून्य है!

ऐसा इसलिए है क्योंकि बायोनिक किडनी गुर्दे की कोशिकाओं से बना है. पहला प्रोटोटाइप एक कॉफी कप के आकार का है और रक्तचाप को नियंत्रित करते हुए शरीर में सोडियम और पोटेशियम के स्तर को संतुलित कर सकता है. यह परियोजना किसी भी डायलिसिस रोगी के लिए बढ़िया खबर है. शुरुआत में (नवंबर 2015), वैज्ञानिकों ने बायोमेडिकल इमेजिंग और बायोइन्जिनियरिंग संस्थान से 6 मिलियन डॉलर प्राप्त किए, और यह कहना सुरक्षित है कि पैसा अच्छी तरह से खर्च किया गया था. वैज्ञानिकों को बायोनिक किडनी से काफी उम्मीदें हैं, और प्रमुख शोधकर्ता, डॉ. विक्टर गुरा का कहना है कि यह उपकरण केवल 2 वर्षों में अर्थात वर्ष 2019 के अंत तक बिक्री के लिए उपलब्ध होगा.

बायोनिक किडनी की तकनीक

बायोनिक किडनी के पीछे की मुख्य तकनीक सिलिकॉन नैनोटेक्नोलॉजी द्वारा बनाई गई एक माइक्रोचिप है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो कंप्यूटरों में इस्तेमाल की जानेवाली माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक के समान है. माइक्रोचिप्स सस्ती हैं और अच्छे फिल्टर के रूप में कार्य करती हैं. प्रत्येक डिवाइस में परतों में लगभग 15 माइक्रोचिप बनाए गए होंगे और यह एक पाड़ के रूप में कार्य करेगा जो कि मूत्राशय कोशिकाओं को जीवित रखता है जो माइक्रोचिप फ़िल्टरों में और आसपास बढ़ेगा. ये कोशिकाएँ जीवित गुर्दे (किडनी) की गतिविधि की नकल करेंगे.

इस प्रक्रिया की मुख्य चुनौती यह है कि बिना थक्के या क्षति के बिना डिवाइस के माध्यम से खून निकले. बायोमेडिकल इंजीनियर अमांडा बक्स द्रव की गतिशीलता का उपयोग कर रहे हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि डिवाइस का कोई भी क्षेत्र रक्त के प्रवाह में अवरोध या बाधा तो पैदा नहीं करेगा.

बायोनिक किडनी में अस्वीकृति के कारक शून्य हैं.

बायोनिक किडनी का सबसे बढ़िया पहलू यह है कि यह एक नियमित दाता किडनी से कई गुणा बेहतर है, क्योंकि इसमें अस्वीकृति कारक शून्य हैं. हाल ही में एक प्रोटोटाइप के रूप में एक कॉफ़ी कप के आकार का रेनियल सेल का आविष्कार किया गया था. यह सोडियम और पोटेशियम के स्तर के संतुलन में कुशलता से काम करता है और रक्तचाप को नियंत्रित भी करता है.

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बायोनिक किडनी के बारे में कुछ मत्वपूर्ण जानकारी देखें

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